सेवा धर्म और उसका स्वरूप

Author: Pt Shriram sharma acharya

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Preface

जन- साधारण की गतिविधियों और क्रिया - कलाप केवल अपने तक ही सीमित रहते हैं ।। सामान्य व्यक्ति अपना सुख और हित देखना ही पर्याप्त समझता है ।। वह सोचता है कि अपने लिए पर्याप्त साधन- सुविधायें जुट जायें, अपने लिए सुखदायक परिस्थितियों हों, इतना काफी है ।। शेष सब चाहे जिस स्थिति में पड़े रहे ।। स्वार्थपरता इसी का नाम है ।। स्व के संकुचित दायरे में पड़े व्यक्तियों की रीति- नीति इसी स्तर की होती है ।। जब उसकी परिधि विस्तृत होती चलती है, व्यक्ति अपनेपन का विकास करता है, तो उसमें दूसरों के लिए भी कुछ करने की उमंग उठने लगती है और व्यक्ति मार्ग पर अग्रसर होने लगता है ।।

आत्मिक चेतना का विकास जैसे- जैसे होने लगता है, सेवा की टीस उसी स्तर की उठने लगती है और व्यक्ति स्वयं की ही नहीं सबकी सुख- सुविधाओं और हित- अहित की चिंता करने लगता है, उनका ध्यान रखने लगता है ।। परमार्थ साधना में लगे व्यक्तियों को उससे भी उत्कृष्ट आनंद और आत्म- संतोष अनुभव होता है, जो स्वार्थ- पूर्ति में ही लगे व्यक्तियों को प्राप्त होता है ।।

पुण्य- परमार्थ, लोक- मंगल, जन- कल्याण समाजहित आदि सेवासाधना के ही पर्यायवाची नाम हैं और इसी में जीवन की सार्थकता है ।। जिन व्यक्तियों ने भी इस पद्धति से जीवन सार्थकता की साधना को, मनुष्य और समाज का स्तर ऊँचा उठाने के लिए योगदान दिया, सामाजिक सुख- शांति में बाधक तत्त्वों का उन्मूलन करने के लिए प्रयत्न किये समाज ने उन्हें सिर आँखों पर उठा लिया ।। महापुरुषों के रूप में आज हम उन्हीं नर- रत्नों का स्मरण और वंदन करते हैं ।।

Table of content

1. सेवा की आवश्यकता और स्वरूप
2. समस्याओं के स्वरूप और कारण
3. सेवा धर्म का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप
4. ज्ञान यज्ञ का व्यावहारिक स्वरूप

Author Pt Shriram sharma acharya
Edition 2013
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 64
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 11:40:PM
  • 24 Sep 2021




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