सत्य नारायण व्रत कथा

Author: Pt. Shriram Sharma Aacharya

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Preface

श्री सत्यनारायण व्रत-कथा का तात्पर्य है, सत्य को साक्षात् भगवान मानकर जीवन में सत्यनारायण का व्रत लेने की चर्चा । सत्य बोलने भर की छोटी क्रिया नहीं वरन् जीवन के हर दोत्र में धर्म-कर्तव्य, नीति, सदाचार, मर्यादा एवं विवेक के आधार पर विचार एवं आचरण करना, सत्यनिष्ठा का समग्र रूप है । सच बोलना भी सत्यनिष्ठा का एक छोटा रूप है । उसकी आवश्यकता है, पर जिस सत्य को नारायण कहा गया है, वह सच बोलने तक सीमित नहीं । सारी मनोवृत्तियों, अकांक्षाओं एवं क्रिया-कलापों को जब धर्म मर्यादाओं के अनुरूप बना लिया जाए, तो समझना चाहिए कि सत्य रूपी भगवान का जीवन में अवतरण हुआ । यह अवतरण ईश्वर-प्राप्ति या ईश्वर-दर्शन का एक रूप है ।

"श्री सत्यनारायण व्रत कथा" में भिक्षाजीवी ब्राह्मण, लकड़हारा, लीलावती-कलावती, साधु वैश्य तुंगध्वज, चन्द्रकेतु आदि का वर्णन है, उनमें एक ही तथ्य का प्रतिपादन है कि सत्यनिष्ठा अपनाने से, सत्यनारायण का व्रत लेने से लौकिक और पारलौकिक दोनों ही जीवन सुख शान्तिमय बनते हैं और इस सत्यवृत्ति को छोड़ देने से नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है ।

Table of content

• प्रथमोऽध्यायः
• द्वितीयोऽध्यायः
• तृतीयोऽध्यायः
• चतुर्थोऽध्यायः
• पञ्चमोऽध्यायः

Author Pt. Shriram Sharma Aacharya
Edition 2013
Publication Yug nirman yojana press
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 88
Dimensions 180X121X3 mm
  • 05:37:PM
  • 4 Aug 2020




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