विवाह संस्कार विवेचन

Author: Pt. Shriram sharma acharya

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Preface

विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है । दो प्राणी अपने अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं । स्त्री-पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषतायें और कुछ अपूर्णतायें रखी हैं । विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं । इनसे एक समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है । इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव-जीवन की एक आवश्यकता माना गया है । एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं एवं भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है । वासना का दाम्पत्य जीवन में अत्यन्त तुच्छ स्थान है प्रधानत: तो दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निर्माण करना है जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके ।

Table of content


• विवाह का स्वरूप
• विशेष व्यवस्था
• विवाह घोषणा
• मंगलाष्टकं
• परस्पर उपहार
• हस्तपीतकरण
• कन्यादान - गुप्तदान
• गोदान
• मर्यादाकरण
• पाणिग्रहण
• ग्रन्थिबन्धन
• वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ
• शिलारोहण
• लाजाहोम एवं परिक्रमा (भाँवर)
• सप्तपदी
• आसन परिवतर्न
• पाद प्रक्षालन
• शपथ आश्वासन
• मंगल तिलक

Author Pt. Shriram sharma acharya
Edition 2009
Publication Yug Nirman Yojana Vistara Press, Mathura
Publisher Yug Nirman Yojana Vistara Trust
Page Length 24
Dimensions 12 cm x 18 cm
  • 08:31:AM
  • 28 Oct 2020




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